कुरुक्षेत्र में बसता है एक लघु भारत : संस्कृति संग्रहालय

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उद्देश्य

विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान देश की भावी पीढ़ी को अपने देश की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर,अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन मूल्यों की जानकारी देने हेतु संस्कृति बोध परियोजना के अंतर्गत संस्कृति ज्ञान परीक्षा,संस्कृति प्रश्नमंच,निबंध प्रतियोगिता का निरंतर आयोजन कर रहा है जिससे कि हमारे छात्र अपने देश के गौरवमय इतिहास से प्रेरणा लेकर,अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव से सुदृढ़ एवं सुसंस्कारित समाज के निर्माण में अपने जीवन का योगदान कर सकें I इसी उद्देश्य से इस प्रकल्प के अंतर्गत संस्कृति संग्रहालय स्थापित किया गया है जिसमें अपने राष्ट्र की अमूल्य प्राचीन धरोहर का दर्शन एवं ज्ञान कराने का लघु प्रयास किया गया है I एक खण्ड में भारत का विशाल आर्ष साहित्य जिसमें चारों वेद,उपनिषद्,अष्टादश महापुराण,भारत की विभिन्न भाषाओँ में रचित रामायण,महाभारत,षटदर्शन,श्रीमदभगवदगीता,त्रिपिटक (बौद्ध),जैनागम (अंग आगम) तथा गुरु ग्रन्थ साहिब का समावेश हैI दूसरे खण्ड में भारतमाता का आकर्षक एवं भावनात्मक मंदिर है जो सहज रूप से मातृभूमि के प्रति भक्ति भाव जागृत करता है I तीसरे खण्ड में प्राचीन मूर्तियाँ जो अधिकांशतः विभिन्न स्थानों पर उत्खनन से प्राप्त हुई है उनकी अनुकृतियाँ तथा सम्पूर्ण देश के प्रमुख मंदिरों,भवनों,प्रसिद्द दुर्गों,स्मारकों के चित्र एवं भारत की नृत्य-संगीत कला की कुछ झलक समाहित है I संग्रहालय का उद्देश्य अपनी दुर्लभ राष्ट्रीय निधि से नयी पीढ़ी को परिचित करना और उनका राष्ट्रीय स्वाभिमान जागृत करना है I

संस्कृति संग्रहालय -

प्रत्येक संग्रहालय की स्थापना किसी विशिष्ट उद्देश्य को लेकर किसी विशेष योजना के अन्तर्गत की जाती है। उसी के अनुसार संग्रहालय का रूप निर्धारित होता है। इस संग्रहालय के माध्यम से भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर से अवगत कराने का लघु प्रयास किया गया है क्योंकि भारत की संस्कृति तथा संस्कृत वांग्मय का भण्डार इतना विस्तृत है कि इसको दर्शान के लिए एक अति विशाल संग्रहालय की आवश्यकता है।

इस संग्रहालय के एक खण्ड में भारत माता का बहुत आकर्षक भावोत्तेजक एवं श्रद्धा उत्पन्न करने वाला स्वरूप एक प्रतिमा के रूप में स्थापित किया हुआ है। शक्ति का प्रतीक सिंह साथ में विराज रहा है। पृष्ठभूमि में अखण्ड भारत का चित्रा दीवार पर अंकित है। स्वर्ण-गैरिक भगवाध्वज माँ के हाथ में सुशोभित है। यह भारतमाता मन्दिर है जिस पर दृष्टि पड़ते ही श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है।

सिंहद्वार से प्रवेश करने पर बायीं ओर प्रथम वीथिका में 11-12वीं शताब्दि में उत्तर प्रदेश (महोबा) श्रावस्ती से प्राप्त बोधिसत्व, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर की मूर्तियों की प्रतिकृतियाँ सुसज्जित हैं। इसी प्रकार की नौ विथिकाओं में भारत के विभिन्न प्रदेशों से प्राप्त पुरातात्विक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण प्रथम से बारहवीं शताब्दी तक की मूर्तियों की प्रतिकृतियाँ हैं जो विभिन्न शैलियों में भारत की मूर्तिकला की विविधता का दर्शन कराती है।

चार पटल ऐसे हैं जिनमें देश के लगभग सभी प्रान्तों के प्रमुख प्राचीन मन्दिरों, ऐतिहासिक अभेद्य दुर्गों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया है जो भारत के गौरवमय इतिहास की झांकी प्रस्तुत करते हैं।

दायीं ओर के एक पटल में भारतीय ललित कलाओं अर्थात् विभिन्न शैली में शास्त्रीय नृत्यों को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। प्राचीन शिल्प, नक्षत्र-ज्ञान एवं मुद्राओं को भी इसी पटल में सजाया गया है।

एक विथिका त्रिपुरा की बांस की बनी हस्तशिल्प, मध्य प्रदेश के बस्तर जिले के निवासियों द्वारा निर्मित एवं कानपुर से प्राप्त काष्ठ की बनी कलाकृति सुसज्जित है।

मुख्य आकर्षण बाली द्वीप से प्राप्त काष्ठ निर्मित गरुड़ की प्रतिमा है जिसको सुदूर पूर्व एशिया के इस द्वीप में भगवान के रूप में पूजा जाता है। इंडोनेशिया से आए कुछ पर्यटकों ने यह मूर्ति भेंट की थी।

दायीं ओर एक अन्य पटल में भगवान जगन्नाथ जी के पुरी स्थित प्राचीन मन्दिर की काष्ठ-मूर्तियों की लघु अनुकृति विराजमान है और उसी के साथ उड़ीसा के शास्त्रीय नृत्य ओडिसी का भी चित्र द्वारा तथा जगन्नाथ मन्दिर को भी भव्य चित्र द्वारा दर्शाया गया है। इसी वीथिका में त्रिपुरा की हस्तकला को दर्शाती दो आकर्षक बाँस एवं काष्ठ की कृतियाँ हैं।

मध्य में एक पटल पर मुख्य द्वार के बिल्कुल सामने उत्खनन से प्राप्त कुबेर की प्राचीन मूर्ति की प्रतिकृति स्थापित है।

संग्रहालय का एक खण्ड प्राचीन वांग्मय एक धर्म ग्रन्थों के लिए रखा गया है जो भारतमाता मन्दिर के बिल्कुल साथ लगा है। इसके आरम्भ में नृत्य करते हुए विनायक (गणेश) की 8वीं शती एवं 5वीं शती की सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की मूर्तियों की प्रतिकृतियाँ लगी हैं।

इस खण्ड के एक पटल में चारों वेद, ब्रह्मण ग्रन्थ, वेदांग के रूप में विभिन्न धर्म सूत्र, गृह सूत्र व श्रोत सूत्र तथा मूल ग्यारह उपनिषद एवं षटदर्शन हैं, सामने के दो पटलों में अठारह महापुराणों को सजाया गया है। दायीं ओर के दो पटलों में भारत की विभिन्न भाषाओं में रची गई रामकथा अर्थात् आंचलिक रामायण, महाभारत, वाल्मीकि रामायण, गीता एवं नीति ग्रन्थ है। दूसरे पटल में त्रिपिटक (बौद्ध) जैन आगम (अंगागम) गुरु ग्रन्थ साहब के दर्शन होते हैं।

संग्रहालय का आकार 51 x 22 फुट है और इसमें उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग संस्कृति के विभिन्न पक्षों को भारत की आगामी पीढ़ी के सामने प्रेरणादायक ढंग से रखने के लिए किया गया है।