Vishwa Hindu Parishad: Contribution to cultural preservation

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Shri Desh Raj ji

   विश्व हिन्दू परिषद्: सांस्कृतिक संरक्षण एवं पुनर्प्रतिष्ठा में योगदान

                                                                                       श्री देश राज शर्मा (महामंत्रीविद्या भारती)

            भारत की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। वैदिक परम्पराएँउपनिषदों का ज्ञानरामायण महाभारत की गाथाएँयोग और आयुर्वेद जैसी विधाएँलोकगीत-लोककला और धर्म-त्योहार भारतीय जीवन का अभिन्न अंग रही हैं। परन्तु समय के साथ विदेशी आक्रमणऔपनिवेशिक शासनस्वतंत्रता के उपरांत सरकार की नीतियाँ तथा पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण ने भारतीय सांस्कृतिक पहचान को गहरा आघात पहुंचाया।

            विदेशों में बसे हिन्दुओं की सस्ंकृति और संस्कारों के संरक्षण की चिंता भी अनेक श्रेष्ठजनों को सता रही थी। त्रिनिदाद में भारत आये एक सांसद डा० कपिलदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गोलवलकर (श्रीगुरु जी) से भेंट करके उन्हें कैराबियाई द्वीप समूह में रह रहे हिन्दुओं पर मंडराते खतरे की बात कही और विदेशस्थ हिन्दुओं से संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इन्हीं परिस्थितियों में यह अनुभव किया जाने लगा था कि विश्व भर के हिंदू समाज के बीच काम करने वाला एक संगठन खड़ा किया जाए। स्वामी चिन्मयानंद जी के मन में भी हिंदुओं के एक विश्वव्यापी संगठन बनाने की इच्छा पनप रही थी। भारत सहित विश्व भर के देशों में रहने वाले हिन्दू समाज के संगठनसांस्कृतिक संरक्षण और पुनर्प्रतिष्ठा हेतु संगठन की आवश्यकता को चिन्तक अनुभव कर रहे थे। इसी चिंतन का परिणाम है विश्व हिन्दू परिषद।

            सन 1964 प्रयागराज में माधव राव सदाशिव गोलवरकर उपाख्य श्रीगुरु जी तत्कालीन पु. सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयास से मास्टर तारा सिंहज्ञानी भूपेन्द्र सिंह अध्यक्ष-शिरोमणि अकाली दल सहित भिन्न-भिन्न 40 से अधिक पंथ सम्प्रदाओं साधू संतो तथा विचारकों ने कृष्ण जन्माष्टमी के दिन विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की।

            विश्व हिन्दू परिषद ने हिन्दू सांस्कृतिक संरक्षण एवं पुनर्प्रतिष्ठा के लिए अनेकों आयामों को देश भर में चलाने की योजना के साथ ‘‘हिन्दवः सोदराः सर्वेन हिन्दू पतितो भवेत्। मम दीक्षा हिन्दू रक्षामम मंत्रः समानता।’’ के उद्धघोष से हिन्दू समाज को एक संगठन सूत्र में पिरोने के लिए भारत एवं विदेश में समस्त हिन्दुओं से सम्पर्क स्थापित करते हुए उनकी सहायताधर्म और संस्कृति के प्रति भक्तिगौरव और निष्ठा की भावना उत्पन्न करने की योजना हुई। हिंदुओं के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को सुरक्षा प्रदान कर उनका विकास और विस्तार करने का संकल्प हुआ। हिंदू समाज के बहिष्कृत और धर्मान्तरित हिंदू जीवन पद्धति के प्रति लगाव रखने वाले भाई-बहिनों को हिंदू धर्म में वापस लाकर उनका पुनर्वास की आवश्यकता अनुभव की गई।

            अपने स्थापना काल से ही विश्व हिन्दू परिषद ने अपने कार्यकर्ताओं का विस्तार एवं विकास करते हुए देश भर में जन जागरण तथा रचनात्मक कार्य प्रारम्भ कर दिए।

            विश्व हिन्दू परिषद ने अपने प्रथम सम्मेलन जनवरी 1966 प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) गंगायमुना एवं सरस्वती के संगम पर चारों पूज्य शंकराचार्यों सहित हिंदुओं के सभी संप्रदायों और पंथों के प्रमुख धर्माचार्यों ने उन हिन्दुओं के लिए जो अपना धर्म एवं समाज किन्हीं परिस्थितियों में त्याग चुके थेजो अपने पूर्वजों के धर्म में वापस आना चाहते हैं उन्हें आत्मसात् कर लिया जाए इस संकल्प का विगुल देश भर में बजा दिया सभा स्वधर्म में वापसी को पूज्य सन्तों द्वारा मान्यता मिल गई।

            विदेशस्थ हिन्दुओं को अपनी मातृभूमि और परम्परागत धार्मिकसामाजिक संस्कारों तथा अपनी संस्कृति को सुदृढ़ करने के लिए कई प्रस्ताव पारित हुएजिनमें मंदिरों का वैभवगोरक्षासंस्कृत का शिक्षण आदि प्रमुख थे।

            श्रीगुरु जी के प्रयत्नों में ‘न हिन्दू पतितो भवेत’ का जयकार पूज्य सन्तों ने किया। असम के जोरहाट में मार्च, 1970 को हुए सम्मेलन में पधारे वनवासीगिरिवासी और नगरवासियों में हिंदुत्व के प्रति प्रेम और आस्था जाग्रत हुई। इसमें भारत के सभी प्रमुख तीर्थों और 45 नदियों का पवित्र जल जलकंुड में डाला गया। इससे यहां के लोगों में भारत की एकता का सन्देश प्रसारित करने से परिषद को बड़ी सफलता मिली। इसी सम्मेलन के परिणामस्वरूप अरुणाचलमणिपुरत्रिपुरामेघालय में भी परिषद की ईकाईयां गठित हुई।

            हिन्दू समाज में व्यापक जन जागरणराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता निर्माण करने के लिए राष्ट्रप्रान्त एवं जिला स्तर पर हिन्दू सम्मेलन हुए।

            पूर्वोतर भारत में ईसाइयों की बढ़ती गतिविधियों पर चिंता प्रकट करते हुए घोषणा हुई कि सभी हिंदू प्रकृति पूजक हैंअतः यह देश हिन्दू राष्ट्र है। 1982 किशनगंज (बिहार) के सम्मेलन में घुसपैठियों के विरुद्ध समाज व सरकार का ध्यान आकृष्ट किया गया। अंडमान द्वीप समूह सम्मेलन 1983, पोर्ट ब्लेयर में 6,000 लोगों की सहभागिता करते हुए बड़ी संख्या में वनवासी उपस्थित रहे। जम्मू सम्मेलन 1981 में पश्चिमोत्तर राज्यों के 7,500 लोगों ने अपनी उपस्थित दर्ज करवाई। मार्च, 1983 अमृतसर में एकत्रित हिन्दुओं के विशाल जनसमूह के लिए स्थानीय गुरुद्वारों ने अपने लंगर खोलकर सिख और गैर-सिख में एकात्मकता के दर्शन करवाए। 1970 का हाड़ौती (राजस्थान), 2005 में ब्यावर (राजस्थान) सम्मेलन में पूर्व में मुस्लिम बने 19,00 लोग पुनः अपने पूर्वजों की परम्परा में वापस आए। 1978 से 2005 तक पंढरपुरमंगेश (गोवा)नरसोवाबाड़ीआलन्दीनागपुरशम्भाजी नगरदेवगिरि आदि स्थानों पर केन्द्र सरकार की मुस्लिम व ईसाई तुष्टीकरण की नीति पर प्रहार किये गए।

            गुजरात के सिद्धपुर में अक्टूबर, 1972 में 15,000 प्रतिनिधियों ने विदेशस्थ हिंदुओं से हो रहे दुर्व्यवहार पर दुःख प्रकट किया वहीं तिरुपति सम्मेलन 1974 में पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज ने हिंदू वोट बैंक बनाने का आह्वान किया।

            विश्व हिन्दू परिषद ने जन जागरण में विचार दिया कि हिन्दू समाज तभी दुनिया में सम्मानपूर्वक जी सकेगाजब प्रत्येक हिन्दू स्वयं को सिर्फ हिन्दू के नाते पहचानेगा। हमें जातिगत भेदभाव को दूर कर हिन्दुओं के नाते संगठित होना होगा। इस हेतु 1982 के एर्नाकुलम् सम्मेलन में 95 धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों के भागीदारी करके अपने संगठन भाव को प्रकट किया।

            1979 में विराट विश्व संस्कृत सम्मेलन डा. कर्ण सिंहमातृ सम्मेलन श्रीमती महादेवी वर्मासंत सम्मेलन महामण्डलेश्वर पूज्य प्रकाशानन्द जी महाराज तथा विश्व हिन्दू सम्मेलन लाला हंसराज की अध्यक्षता में सम्पन्न हुए। इन सम्मेलनों में प्राप्त उर्जा के कारण ‘स्त्री ही संस्कारित समाज का निर्माण कर सकती हैसेवावृत्ति स्त्री का सहज स्वभाव है और पावित्र्य की रक्षा करने के लिए अग्रसर हुई। महिलाएं ने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और समाज के उपेक्षित महिलाओं के विकास के लिए समुचित प्रयास प्रारम्भ किए। सन्तों ने समाज में फैल रही भ्रान्तियों का उत्तर देना शुरू किया तथा हिन्दूहिन्दीसंस्कृति और गोमाता की रक्षा का दायित्व स्वीकार करते हुए घोषणा की कि जिस धर्म की रक्षा हम अपने मठों में बैठकर कर रहे हैंउसी की रक्षा के लिए गाँव-गाँव भ्रमण करके जागरण का मंत्र फूंकेगे। संत समाज ने व्यक्तियों को सुसंस्कार देने हेतु वनवासियों के कल्याण के लिए तीव्र गति से कार्य करना प्रारम्भ किया। विदेशस्थ हिन्दुओं की गौरव रक्षासुरक्षासहयोग एवं बंगलादेश के हिन्दुओं के प्रति अत्याचार के विरोध में देश-विदेश के एक लाख से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लेकर कार्य योजना तैयार की।

            2007 प्रयागराज अर्थ कुम्भ मेले में दो लाख की उपस्थिति ने भारत हिन्दूराष्ट्र हैइसी एक सूत्र को आधार बनाकर सन्तों ने समाज का मार्गदर्शन किया।

            धर्मान्तरण विषय पर परिषद ने धर्मप्रसार करते हुए उन जातियों को चिन्हित किया जिन्होंने जेहादी आक्रमणकारियों के भय से मुस्लिम रीतियों का पालन करना आरम्भ कर दिया था तथा मुस्लिम रीतियों के साथ-साथ हिन्दू संस्कारों का भी पालन करती रही। ऐसी ही मेहरात जैसी जातियों के 80 हजार से अधिक मेहरातों की घर वापसी हुई। इनके ग्रामों में लगभग 60 मंदिरों का निर्माण किया गया है तथा ग्रामों में भजन मण्डलियांविद्यालयछात्रावास आदि का संचालन किया।

            राजस्थान के ही बांसवाड़ा जिला में 70 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों को चर्च ने भील वनवासियों को भारी संख्या में ईसाई बनाया। उनमें भाव जागरण करके या वापसी हुई। जनजातीय क्षेत्रों में विद्यालयों प्रारम्भ करके हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाने का प्रबंध किया। 30 छात्रावास एवं 636 भजन मंडलियों के माध्यम से जनजातीय बन्धुओं से सम्पर्क बना।

            रामनाथपुरमइंदतकुराई जो कसबे/गाँव मुस्लिम इसाई बन गए थे ऐसे देश भर के भिन्न-भिन्न स्थानों पर जहाँ-जहाँ सन्तों का सम्पर्क बढ़ा वहाँ-वहाँ परावर्तन (घरवापसी) के कार्यक्रम हुए। 1981 में तमिलनाडु के एक कस्बे मीनाक्षीपुरम में बड़ी संख्या में हरिजन परिवारों को मुस्लिम बना लिए जाने से हिन्दू समाज चकित रह गया। परिषद ने इनको वापस लाने का संकल्प लिया। हिन्दू समाज में नई चेतना जागी। संस्कृति रक्षा योजना बनी। देश भर में धर्मान्तरण के विरुद्ध व्यापक जन जागरण का संकल्प लिया गया। गाँव-गाँव सम्पर्कजनसभाएंसमूह बैठकेंप्रभात फेरियाँसन्तों के प्रवचन प्रारम्भ हुए।

जिनकी घरवापसी हुई उनको शिक्षित व संस्कारित करनाउन्हें ठीक प्रकार बसाना, सुरक्षा करनारोजी-रोटी का प्रबन्ध करनासन्तति को शिक्षित बनाने का कार्य प्रारम्भ हुआ। इस दृष्टि से संस्कार केन्द्रों का संचालनमंदिरों का निर्माणभजनमंडलियों का गठनविद्यालयछात्रावास निर्माणकथा- प्रवचन कार्यक्रम किए गए। इस हेतु सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजनत्योहारोंतीर्थयात्राओंसभी को सम्मानित करने का कार्यवाल्मीकि जयन्तीरविदास जयन्ती मनाना, ‘न हिन्दू पतितो भवेत’, ‘हिंदुत्व सोदरा सर्वे’ के भाव को प्रबल किया गया।

            विश्व हिन्दू परिषद के प्रयास से द्वारका तथा शृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य और मध्व तथा वल्लभ संप्रदायों के पूज्य आचार्यों ने छुआछूत का विरोध किया। देशभर में शिक्षाआरोग्यस्वावलम्बन के लिए सेवा कार्य प्रारम्भ हुए। ज्ञान रथं यात्राएंधर्म सम्मेलनअस्पृश्यता कार्यक्रमहिंदू एकता कार्यक्रम धर्म यात्राएं, ग्रामीण मंदिर के पुजारियों का प्रशिक्षण एवं सम्मेलनसंतों का हरिजन बस्तियों में भ्रमण तथा भोजन ग्रहण कार्यक्रम एवं शोभायात्राएं सम्पन्न हुई जिसमें लाखों परिवारों से सम्पर्क हुआ तथा नई चेतना का प्रसार हुआ। इन यात्राओं के दौरान हनुमान चालीसासुन्दरकाण्डरामचरितमानसश्रीमद्भगवद्गीताश्रीराम के चित्र व लाकेट वनवासी समाज को सन्तों द्वारा भेंट किए गए। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास नवम्बर 1989 में बिहार के एक हरिजन कार्यकर्ता श्री कामेश्वर चौपाल जी से कराया गया।

            सांस्कृतिक संरक्षण में धर्मशिक्षा शिविरों में प्रतिभागियों को धार्मिक ग्रंथों जैसे गीतारामायणमहाभारतउपनिषद आदि का सरल और जीवनोपयोगी ज्ञान कराया जाता रहा। वैदिक मंत्रोच्चारणश्लोक वाचनभजन कीर्तन एवं कथा प्रवचन के माध्यम से उन्हें धर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया गया। यहाँ धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न मानकर सत्यअहिंसासेवात्याग और नैतिकता से जुड़ी जीवन पद्धति के रूप में समझाया गया। इन शिविरों से नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी तथा उनमें नैतिक मूल्यों का विकास हुआ।

            समय-समय पर आक्रमणोंउपेक्षा के कारण धार्मिक स्थलों को क्षति पहुँचती रही। ऐसे समय में विश्व हिन्दू परिषद् ने इनके संरक्षण का दायित्व आपने हाथों में लिया। जर्जर और उपेक्षित मंदिरों का जीर्णोद्धार किया तथा अनेक स्थानों पर भव्य मंदिर निर्माण का कार्य भी कराया। प्राचीन मंदिरों और धार्मिक धरोहरों के जीर्णाद्धार से समाज में आस्था और श्रद्धा का वातावरण मजबूत हुआ। देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं को सुव्यवस्थित धार्मिक वातावरण प्राप्त हुआ। इन प्रयासों से भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को नई शक्ति मिली। नई पीढ़ी के लिए अपने धर्म और परम्पराओं से जुड़ाव की भावना प्रबल हुई। श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या की मुक्ति और वहाँ भव्य राम मंदिर निर्माण विश्व हिन्दू परिषद के सबसे बड़े योगदानों में से एक है।

            विश्व हिन्दू परिषद् केवल धार्मिक संगठन न होकर सांस्कृतिक जागरण का भी केंद्र है जिसने भारतीय समाज को उसकी जड़ों लोककलापरंपरा और संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारत की पहचान उसकी विविध लोककलाओंनृत्यसंगीतवाद्ययंत्रोंत्योहारों और परंपराओं में निहित है। विश्व हिन्दू परिषद इन परम्पराओं को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रही है। विभिन्न सांस्कृतिक यात्राएँ और शोभायात्राएँ के माध्यम से परिषद् ने समाज में यह चेतना उत्पन्न की कि लोककला केवल मनोरंजर नहींबल्कि संस्कृति की आत्मा है।

            परिषद ने समय-समय पर वैश्विक हिन्दू सम्मेलन आयोजित किए हैं। इन सम्मेलनों में न केवल भारत से बल्कि अमेरिकायूरोपएशियाअफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे महादीपों से भी प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इससे प्रवासी भारतीयों और हिन्दुओं को जोड़कर उन्हें हिन्दू समाज की एकताअपनी परंपराओंत्योहारों और सांस्कृतिक अनुभवों को साझा करनाहिन्दू अपने धर्मस्थलोंत्योहारों और परंपराओं की रक्षा में सहयोगी बने।

            अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति और राममंदिर निर्माण के राम-जानकी रथ यात्राशिला पूजनश्रीराम ज्योति यात्रा आदि ने सम्पूर्ण हिन्दू समाज में सांस्कृतिक चेतना का संचार किया। धर्मांतरण का शिकार हुए परिवारों को पुनः हिन्दू समाज में प्रतिष्ठित करने की पहलशिक्षास्वास्थ्यआपदा राहत और वनवासी कल्याण योजनाओं के माध्यम से सेवाअंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाकर हिन्दू समाज की पुनर्प्रतिष्ठा की।

            सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद ने केवल भारत में ही नहींबल्कि विश्वभर में हिन्दू संस्कृति के संरक्षण और पुनर्प्रतिष्ठा का अद्वितीय कार्य यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक धरोहर केवल अतीत की स्मृति नहींबल्कि राष्ट्र की पहचान और भविष्य की दिशा भी है।